इंटरव्यू – राकेश अमर गोयल राग

इंटरव्यू – राकेश अमर गोयल राग

1. सबसे पहले, आपकी नवीनतम कृति गुप्तचर सम्राज्ञी के प्रकाशन पर हमारी हार्दिक बधाई स्वीकार करें। इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

बधाई  के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। इस अवसर पर, मैं इस पुस्तक प्रकाशन परियोजना के सफल निष्पादन में असाधारण प्रतिबद्धता और उत्कृष्ट सहयोग के लिए श्री शुभम् चौरसिया और लिट्रेचर्सलाइट पब्लिशिंग टीम के प्रति अपना हार्दिक आभार भी व्यक्त करना चाहूँगा।

इस उपन्यास को लिखने के लिए मुझे तीन मुख्य स्रोतों से प्रेरणा मिली।

सर्वप्रथम जो प्रेरणा मुझे मिली, वह थी हमारे चारों ओर तेजी से बदलती दुनिया को देखने से। हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं जहाँ एक तरफ डिजिटल टेक्नोलॉजी हमारे जीवन को नियंत्रित कर रही है, तो दूसरी तरफ आज भी हमारे समाज में तंत्र-मंत्र और पुरानी मान्यताएँ गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। मुझे लगा कि एक दूसरे से विपरीत प्रतीत होने वाले इन दो संसारों— डिजिटल टेक्नोलॉजी और तंत्र-मंत्र— को आमने-सामने लाने से एक अत्यंत रोचक और विचारोत्तेजक कथा का जन्म हो सकता है। यही विचार इस उपन्यास की आधारशिला बना।

मेरी प्रेरणा का दूसरा स्रोत था: खुफिया तंत्र और जासूसी की दुनिया में मेरी गहन रुचि। खुफिया-तंत्र की जटिल दुनिया, जासूसी के दाँव-पेंच और उनसे जुड़ी अनिश्चितताओं ने कथा को स्वाभाविक रूप से रोमांचकारी बनाने में गहन योगदान दिया।

प्रेरणा का तीसरा स्रोत मेरा यह दृढ़ विश्वास रहा कि टेक्नोलॉजी चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, वह प्रेम, विश्वास, भय, धोखा, दर्द और रिश्तों जैसी मानवीय भावनाओं का विकल्प कभी नहीं बन सकती। इसलिए मैं चाहता था कि इस कथा के केंद्र में मानव तत्व भी उपस्थित रहे—मनुष्य की संवेदनाएँ, उसके द्वंद्व, उसका प्रेम और उसकी कमजोरियाँ। इस उपन्यास में जहाँ एक ओर डिजिटल टेक्नोलॉजी की चकाचौंध, तांत्रिक रहस्य और जासूसी की उलझी कड़ियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर, धड़कती हुई मानवीय संवेदनाओं का समंदर  भी  हिलोरे मार रहा है। डिजिटल टेक्नोलॉजी, तंत्र-मंत्र, जासूसी और  मानवीय भावनाओं का यही संगम इस उपन्यास की आत्मा का निर्माण करता है।

2. आपने इस उपन्यास का शीर्षक गुप्तचर सम्राज्ञी क्यों चुना? क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण है?

यह प्रश्न मेरे लिए केवल शीर्षक-चयन का नहीं, बल्कि पूरे उपन्यास की आत्मा का प्रश्न है। गुप्तचर सम्राज्ञी  शीर्षक मैंने बहुत सोच-विचार के बाद चुना, क्योंकि मेरे लिए यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि पूरे उपन्यास के कथ्य, वातावरण और उसकी केंद्रीय नायिका का सार है।

इस उपन्यास की नायिका एक परंपरागत जासूस नहीं है। वह घटनाओं की मात्र सहभागी नहीं, बल्कि उन्हें दिशा देने वाली एक असाधारण, बुद्धिमान और बहुआयामी महिला है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति शारीरिक सामर्थ्य नहीं, बल्कि उसकी प्रखर बुद्धि, मनोवैज्ञानिक सूझ-बूझ, रणनीतिक कौशल और जटिल परिस्थितियों पर नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता है। इसलिए मुझे लगा कि ‘सम्राज्ञी’ शब्द उसके व्यक्तित्व की गरिमा, प्रभाव और रहस्यमय प्रभुत्व को सर्वाधिक सशक्त रूप में अभिव्यक्त करता है।

शीर्षक का पहला शब्द ‘गुप्तचर’ अपने साथ जासूसी, गुप्त अभियानों, षड्यंत्रों, खुफिया तंत्र और निरंतर मंडराते खतरे का संसार लेकर आता है। वहीं ‘सम्राज्ञी’ शब्द एक ऐसी रहस्यमयी और प्रभावशाली स्त्री की छवि निर्मित करता है, जिसकी शक्ति केवल अधिकार में नहीं, बल्कि बुद्धि, आकर्षण, मनोवैज्ञानिक नियंत्रण और रणनीतिक चातुर्य में निहित है। इन दोनों शब्दों का संयोजन पाठक के मन में तुरंत यह प्रश्न जगाता है—आख़िर यह गुप्तचर सम्राज्ञी कौन है, और उसकी शक्ति का स्रोत क्या है?

एक और कारण मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। अधिकांश पारंपरिक जासूसी उपन्यासों में पुरुष नायक केंद्र में रहते हैं, जबकि इस रचना में मैंने एक सशक्त महिला गुप्तचर को कथानक का ध्रुव बनाया है। इसलिए शीर्षक में ही उसकी उपस्थिति को प्रमुखता देना मुझे आवश्यक लगा।

साहित्यिक दृष्टि से भी यह शीर्षक मुझे इसलिए उपयुक्त लगा क्योंकि यह छोटा, स्मरणीय, रहस्यपूर्ण और जिज्ञासा-उत्तेजक है। इसमें एक सिनेमाई आकर्षण, थ्रिलर जैसी गति और कथात्मक लय है। मेरे विचार में, गुप्तचर सम्राज्ञी शीर्षक उपन्यास के रोमांच, षड्यंत्र, रहस्य और उसकी केंद्रीय महिला पात्र—इन सभी का प्रभावी प्रतिनिधित्व करता है।

3. इस कहानी को लिखते समय आपको किस भाग को गढ़ना सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण अथवा आनंददायक लगा?

यदि मुझे इस उपन्यास का सबसे चुनौतीपूर्ण और साथ ही सबसे आनंददायक भाग चुनना हो, तो मैं निस्संदेह अध्याय 16 (‘देशव्यापी हलचल)  का उल्लेख करूँगा। इस अध्याय में मैंने एक काल्पनिक परिदृश्य रचा है, जिसमें मीडिया के माध्यम से हुए एक सनसनीखेज़ खुलासे के बाद पूरे देश में मानो विस्फोट-सा हो जाता है। उस एक समाचार की प्रतिध्वनि राजनीति, प्रशासन, खुफिया तंत्र, मीडिया और आम जनमानस—सभी को एक साथ झकझोर देती है।

इस अध्याय को लिखना चुनौतीपूर्ण इसलिए था कि मुझे केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करना था, बल्कि यह भी विश्वसनीय ढंग से दिखाना था कि एक बड़ा खुलासा किस प्रकार अलग-अलग वर्गों की मानसिकता, प्रतिक्रियाओं और निर्णयों को प्रभावित करता है। दूसरी ओर, यही रचनात्मक चुनौती मेरे लिए अत्यंत आनंददायक भी रही। एक लेखक के रूप में मुझे ऐसा लगा मानो मैं घटनाओं के केंद्र में खड़ा होकर पूरे राष्ट्र की धड़कनों को शब्द दे रहा हूँ। इस अध्याय को लिखते समय कल्पना, गति, तनाव और यथार्थ—इन चारों के बीच संतुलन साधना मेरे लिए एक अत्यंत संतोषप्रद सृजनात्मक अनुभव था।

4. आपने जासूसी और तांत्रिक रहस्यों को एक साथ जोड़ने का विचार किस प्रकार विकसित किया?

मेरे भीतर जासूसी और तांत्रिक रहस्यों को एक साथ जोड़ने का विचार किसी एक क्षण में नहीं आया; वह वर्षों तक पनपती रही एक जिज्ञासा का परिणाम है। बचपन से ही एक ओर जासूसी कथाओं की तर्कशक्ति, सूक्ष्म निरीक्षण और रहस्य-भेदन की प्रक्रिया मुझे आकर्षित करती थी, तो दूसरी ओर लोककथाओं और तांत्रिक परंपराओं के गूढ़ रहस्य मेरी कल्पना को उद्वेलित करते थे। समय के साथ मुझे यह महसूस हुआ कि जासूस और तांत्रिक, देखने में भले ही दो अलग संसारों के पात्र प्रतीत होते हों, पर उनमें एक अद्भुत समानता है—दोनों ही उन संकेतों और सत्यों को पहचानने का दावा करते हैं जिन्हें सामान्य व्यक्ति देख नहीं पाता। तभी मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि यदि इन दोनों संसारों का आमना-सामना हो, तो कैसी कथा जन्म ले सकती है?

इसके साथ-साथ मेरे भीतर एक और जिज्ञासा भी लगातार बनी रही—क्या तंत्र-मंत्र के पीछे वास्तव में कोई अलौकिक शक्ति कार्य करती है, या फिर यह मनुष्य के मनोविज्ञान, विश्वास और छल-कपट का अत्यंत परिष्कृत खेल है? इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर मुझे कभी नहीं मिला, किंतु इसी अनिश्चितता ने मेरी कल्पना को निरंतर ऊर्जा दी। मैंने सोचा कि यदि  जासूसी और तांत्रिक रहस्यों को एक साथ जोड़ कर एक ताना-बाना बुना जाए, तो कथा कहीं अधिक रोचक और बहुआयामी बन सकती है।

धीरे-धीरे मुझे यह भी अनुभव हुआ कि जासूसी और तंत्र-मंत्र, दोनों का मूल आधार किसी न किसी प्रकार का गोपनीय ज्ञान है। जासूसी की दुनिया में यह गोपनीय सूचनाएँ, छिपे हुए तथ्य और षड्यंत्र होते हैं; जबकि तांत्रिक परंपरा में इसके अंतर्गत गूढ़ विद्याएँ, रहस्य और गुप्त अनुष्ठान आते  हैं। यही समानता मेरे लिए दोनों क्षेत्रों के बीच एक स्वाभाविक सेतु बन गई।

5. उपन्यास की केंद्रीय किरदार, महिला गुप्तचर, को गढ़ते समय आपने किन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया?

यह प्रश्न मेरे लिए केवल एक पात्र-निर्माण का नहीं,बल्कि एक ऐसी स्त्री-चेतना को गढ़ने का था जो परम्परागत जासूसी कथाओं की सीमाओं को तोड़ सके। इसलिए मैंने सम्राज्ञी को केवल एक महिला गुप्तचर के रूप में नहीं, बल्कि जासूसी,तंत्र-मंत्र,मनोविज्ञान,डिजिटल टेक्नोलॉजी और सत्ता-लिप्सा के विलक्षण संगम के रूप में रचा। वह गुप्त संकेतों,कूटबद्ध संदेशों,अत्याधुनिक साइबर तकनीकों और गूढ़ तांत्रिक अनुष्ठानों— इन सभी संसारों में समान अधिकार से विचरण करती है। उसके लिए आधुनिक निगरानी उपकरण और तांत्रिक क्रियाएँ विरोधी नहीं,बल्कि एक-दूसरे के पूरक साधन हैं।

कहानी की यह मांग थी कि उसके व्यक्तित्व को किसी सीमित परिभाषा में न बांधा जाए। बाहरी दुनिया की दृष्टि में वह एक प्रतिष्ठित होटल की आतिथ्य विभाग की प्रमुख,तेज़-तर्रार और मिलनसार महिला है;किन्तु उसी विनम्र मुस्कान और सहज व्यवहार की आड़  में एक ऐसा मस्तिष्क सक्रिय है जो पर्दे के पीछे से एक विशाल गुप्तचर नेटवर्क संचालित करता है। रोमांस, आकर्षण और विश्वास उसके लिए भावनाएँ नहीं,बल्कि जासूसी के अत्यन्त प्रभावी अस्त्र हैं। उसने एक अत्यन्त सुनियोजित हनीट्रैप तंत्र विकसित किया है,जहाँ प्रेम के भ्रम में फँसाए गए लोगों से निकले सैन्य रहस्य डिजिटल रूप में कूटबद्ध होकर सीमा पार पहुँच जाते हैं। इस प्रकार रोमांस,जासूसी और डिजिटल टेक्नोलॉजी—तीनों एक ही षड्यंत्रकारी संरचना का हिस्सा बन जाते हैं।

उसके चरित्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी मनोवैज्ञानिक जटिलता है। वह केवल हथियारों या तकनीक से नहीं,बल्कि शब्दों,मौन,आकर्षण और अभिनय से भी लड़ती है। पुलिस पूछताछ के दौरान वह कभी दार्शनिक बन जाती है,कभी व्यंग्य करती है,कभी स्वयं को एक गलत समझी गई स्त्री के रूप में प्रस्तुत करती है। उसका प्रत्येक उत्तर सत्य को छिपाते हुए एक नया भ्रम रचता है। उसका मौन उसके शब्दों से कहीं अधिक अर्थपूर्ण है,और उसकी आँखों में ऐसी गहराई है जिसे पढ़ पाना लगभग असंभव है। वह लोगों के मनोविज्ञान को समझती ही नहीं,उसे अपनी इच्छानुसार मोड़ भी देती है।

मैंने उसके भीतर सत्ता के प्रति एक विकृत आकर्षण भी रखा है। उसके लिए ‘सम्राज्ञी’ केवल एक गुप्त नाम नहीं,बल्कि उसकी आत्म-छवि है। वह स्वयं को परिस्थितियों,मनुष्यों और उनकी नियति पर अधिकार रखने वाली शासक के रूप में देखती है। यही कारण है कि अपने गुप्तचर साम्राज्य की रक्षा के लिए वह हत्या,अपहरण या किसी भी क्रूर निर्णय से पीछे नहीं हटती। अपने नेटवर्क में उसका एक शब्द अंतिम आदेश होता है,और उसी से उसके आतंक तथा प्रभाव दोनों की स्थापना होती है।

कुल मिला कर, मेरा प्रयास यह रहा कि सम्राज्ञी एक ऐसी रहस्यमयीऔर करिश्माई महिला के रूप में उभरे,जो जितनी आकर्षक है, उतनी ही भयावह भी।  यही इस किरदार की सर्वाधिक प्रबल विशेषता है।

6. इस उपन्यास को पूर्ण करने में आपको कितना समय लगा?

इस उपन्यास को धरातल पर उतारने में मुझे लगभग एक वर्ष का समय लगा। इसके साथ-साथ विगत एक वर्ष से मैं कुछ अन्य पुस्तकों पर भी काम करता  रहा हूँ। यह उपन्यास उसी निरंतर चलने वाली रचनात्मक प्रक्रिया का एक अंग है।  

7. बैंकिंग क्षेत्र में आपके दीर्घकालिक अनुभव ने इस रचना को आकार देने में किस प्रकार योगदान दिया?

मेरे लिए बैंकिंग केवल एक व्यवसाय नहीं था; वह भारतीय समाज, मानव-स्वभाव और अपराध की बदलती प्रकृति को निकट से देखने का एक अद्वितीय अवसर भी था। बैंकिंग क्षेत्र में अधिकारी के रूप में पैंतीस वर्षों के कार्यकाल के दौरान मेरा अधिकांश समय देश के विभिन्न भागों में स्थित बैंकों के निरीक्षण कार्य में बीता। इन यात्राओं ने मुझे केवल बैंकिंग व्यवस्था की जटिलताओं से ही परिचित नहीं कराया, बल्कि यह भी अनुभव कराया कि अपराध किस प्रकार परिस्थितियों, तकनीक और मानवीय कमजोरियों के साथ स्वयं को निरंतर नया रूप देता रहता है।

बैंकिंग धोखाधड़ियों के मामलों का अध्ययन और उनकी कार्यप्रणाली को समझते हुए मेरे मन में बार-बार यह विचार उभरता था कि किसी भी अपराध की सफलता केवल अपराधी की चतुराई पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उससे कहीं अधिक इस बात पर निर्भर करती है कि सूचना किसके पास है, उसे कितनी शीघ्रता से पहचाना जाता है और उसका विश्लेषण किस दक्षता से किया जाता है। वहीं से मेरे भीतर खुफिया तंत्र और जासूसी की दुनिया के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई। मेरे उपन्यास का जासूसी पक्ष उसी अनुभव की स्वाभाविक परिणति है।

उदारीकरण के बाद भारतीय बैंकिंग व्यवस्था ने जिस तीव्र गति से डिजिटल रूप धारण किया, उसी गति से अपराधों का स्वरूप भी बदलने लगा। पारंपरिक धोखाधड़ियों का स्थान साइबर अपराधों, डिजिटल छेड़छाड़ और टेक्नोलॉजी-आधारित वित्तीय अपराधों ने लेना शुरू कर दिया। बैंकिंग क्षेत्र में कार्यरत रहते हुए इस परिवर्तन का मुझे  प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। तभी यह गहराई से समझ में आया कि आज के युग में डिजिटल टेक्नोलॉजी, साइबर अपराध और खुफिया तंत्र एक ही कथा के परस्पर जुड़े हुए अध्याय हैं। यही कारण है कि मेरे उपन्यास में डिजिटल टेक्नोलॉजी केवल एक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कथा की धड़कन है।

बैंकों के निरीक्षण कार्य ने मुझे महानगरों से लेकर देश के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक पहुँचाया। वहाँ लोगों से संवाद करते हुए मैंने एक और रोचक सत्य को अनुभव किया—विज्ञान और डिजिटल टेक्नोलॉजी के इस युग में भी तंत्र-मंत्र और अभिचार से जुड़े विश्वास अनेक लोगों के जीवन और निर्णयों को गहराई से प्रभावित करते हैं। एक ओर साइबर जगत और डिजिटल नेटवर्क का विस्तार हो रहा था, तो दूसरी ओर तंत्र-मंत्र और अभिचार का आकर्षण भी समानांतर रूप से जीवित था। मुझे लगा कि यही विरोधाभास हमारे समय की सबसे रोचक सच्चाइयों में से एक है। इसी से मेरे मन में डिजिटल टेक्नोलॉजी, खुफिया तंत्र, और तंत्र-मंत्र को एक ही कथा-सूत्र में पिरोने का विचार आया, जो इस उपन्यास की विशिष्ट पहचान है।

8. क्या आप निकट भविष्य में किसी अन्य रचना पर कार्य कर रहे हैं, जिसके बारे में आप हमारे पाठकों को बताना चाहेंगे?

मैं फिलहाल एक ऐतिहासिक-रोमांटिक उपन्यास पर कार्य कर रहा हूँ। यह एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि  के परिप्रेक्ष्य में एक प्रेम-प्रसंग पर आधारित है, जिसमें दिल को छू जाने वाली, दो प्रेमियों की प्रेम कहानी एक जीवंत दर्पण के समान है, जो दो सभ्यताओं के मिलन के गूढ़ सत्यों को उजागर करती है।

9. नवोदित लेखकों को, जो थ्रिलर अथवा जासूसी शैली में लिखना चाहते हैं, आप क्या मार्गदर्शन देना चाहेंगे?

सबसे पहले तो मैं यह रेखांकित करना चाहूँगा कि थ्रिलर और जासूसी साहित्य लिखना केवल पन्नों पर रक्त के धब्बे बिखेरना या किसी शातिर अपराधी को पकड़ने की कहानी कहना नहीं है। यह मानव-मन के उन अँधेरे गलियारों में उतरने जैसा है, जहाँ भय, अपराध, लालच  और विश्वासघात निवास करते हैं।  लेकिन उसी अँधेरे में आशा, न्याय और मानवीय गरिमा का एक दीप भी प्रज्वलित करना होता है।

जो नवोदित लेखक इस विधा में लिखना चाहते हैं, उनसे मेरा आग्रह रहेगा कि एक अच्छी थ्रिलर कहानी पाठक की धड़कनें तेज कर देती है, और एक उत्कृष्ट थ्रिलर लेखक पाठक के दिल को छू लेता है। जब आप कोई रहस्य रचें, तो केवल यह मत सोचिए कि “अपराध किसने किया? बल्कि यह भी पूछिए कि उस अपराध ने कितनी जिंदगियों को भीतर तक बदल दिया, कितने स्वप्न तोड़ दिए, और कितने संबंधों को हमेशा के लिए घायल कर दिया। जब तक आपके पात्रों का भय, उनका दर्द, और उनका संघर्ष वास्तविक नहीं होगा, तब तक आपकी कथा का रोमांच भी केवल सतही रह जाएगा।

यह भी स्मरण रखिए कि जासूसी कथाओं के नायक और नायिकाएँ प्राय: टूटे हुए लोग होते हैं।  वे अपने अतीत के घावों, अपराध-बोध, असफलताओं और अधूरे संघर्षों के साथ जीने वाले मनुष्य होते हैं। उनके घावों को छिपाइए मत; वही उन्हें विश्वसनीय और अविस्मरणीय बनाते हैं।

एक थ्रिलर लेखक के रूप में आपको समाज और मानव-स्वभाव की अनेक विकृतियों से साक्षात्कार करना पड़ेगा। परंतु इसी विधा की सबसे बड़ी सुंदरता यह है कि कथा चाहे कितनी ही भयावह क्यों न हो, उसके अंतिम पृष्ठ पर सत्य, न्याय और मानवीय मूल्यों की विजय का प्रकाश अवश्य दिखाई देना चाहिए। आप केवल भय बेचने वाले लेखक न बनें; उस भय के पार न्याय, आशा और साहस का मार्ग भी दिखाइए।

अंत में, मैं यही कहूँगा कि जब आप लिखना आरम्भ करें, तो अपनी लेखनी को किसी बने-बनाए सूत्र, किसी प्रचलित फॉर्मूले, या किसी कृत्रिम नियमावली में मत बाँधिए। अपनी कथा को पूर्ण ईमानदारी, संवेदनशीलता और गहनता के साथ कागज़ पर उतरने दीजिए। यदि लिखते समय आपकी अपनी आँखें नम नहीं हुईं, यदि किसी मोड़ पर आपका अपना हृदय तीव्र गति से नहीं धड़का, तो आपके पाठक का भी नहीं धड़केगा। हिचकिचाइए मत। पहला कदम उठाइए और संसार को ऐसी पहेली दीजिए, जिसका समाधान करते-करते मनुष्य केवल अपराध का रहस्य ही न सुलझाए, बल्कि स्वयं भी अधिक श्रेष्ठ, अधिक उदात्त और अधिक मानवीय बन जाए।

10. क्या आप सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं? पाठक आपसे किस प्रकार संपर्क कर सकते हैं?

मैं Instagram (https://www.instagram.com/raag24.26/) और  Facebook (https://www.facebook.com/profile.php?id=61573299065773&rdid=VXOYcu51fkz3ZIcX) पर उपलब्ध हूँ। पाठक मुझसे ई-मेल से भी संपर्क कर सकते हैं। मेरा ई-मेल ID है: raag2760@gmail.com

11. पाठक यह पुस्तक कहाँ से प्राप्त कर सकते हैं?

‘गुप्तचर सम्राज्ञी’ पुस्तक (पेपरबैक) निम्न स्रोतों से ऑनलाइन प्राप्त की जा सकती है:

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12. हमारे सवालों के जवाब देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

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