लेखक: डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
पब्लिशर: इंकसाईट पब्लिशर्स
ISBN: 9789347263668
भारतीय ज्ञान–परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और औपनिवेशिक इतिहास पर गंभीर चिंतन करने वाले विद्वानों और शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण कृति का विमोचन हुआ है—“लॉर्ड मैकाले: नायक अथवा खलनायक?”।
यह पुस्तक प्रतिष्ठित दार्शनिक, लेखक, भाषाशास्त्री और भारतीय सांस्कृतिक विमर्श के प्रखर विचारक डॉ. विद्यासागर उपाध्याय द्वारा रचित है।
यह ग्रंथ न केवल इतिहास का विश्लेषण है, बल्कि भारत के आत्मबोध, सांस्कृतिक संघर्ष और बौद्धिक मुक्ति की एक सशक्त पुकार भी है। लेखक ने अत्यंत गहन शोध, प्रखर चेतना और असाधारण वैचारिक स्पष्टता के साथ लॉर्ड मैकाले के व्यक्तित्व, विचारों और उनके भारतीय सभ्यता पर पड़े दीर्घकालिक प्रभावों का सूक्ष्म अध्ययन प्रस्तुत किया है।
पुस्तक का मूल प्रश्न—क्या मैकाले आधुनिकता का शिल्पकार था या सांस्कृतिक विस्मृति का निर्माता?
1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले द्वारा प्रस्तुत “Minute on Indian Education” भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इस दस्तावेज़ ने भारतीय पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को नकारते हुए अंग्रेज़ी शिक्षा को भारत की “एकमात्र प्रगतिशील राह” के रूप में प्रस्तुत किया।
मैकाले ने दावा किया था कि भारत की भाषाओं, उसके ज्ञान-संग्रह, उसके दार्शनिक ग्रंथों और उसकी परंपराओं का मूल्य “एक शेल्फ भर अंग्रेज़ी पुस्तकों” के समकक्ष भी नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट कहा—“हम एक ऐसा वर्ग तैयार करेंगे जो रक्त से भारतीय होगा, पर विचारों और दृष्टि से अंग्रेज़।”
डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की यह पुस्तक इसी प्रश्न से जूझती है—
क्या मैकाले ने भारतीयता को आधुनिक दिशा दी या भारतीय आत्मा को औपनिवेशिक जंजीरों में कैद कर दिया?
यह कृति पाठक को बार-बार सोचने पर मजबूर करती है कि—
अगर आज मैकाले भारत लौट आएँ तो क्या देखते?
क्या भारत अपने ज्ञान-वैभव के साथ आगे बढ़ रहा है या अभी भी मैकाले की छाया में खड़ा है?
पुस्तक का सार—औपनिवेशिक शिक्षा से आधुनिक भारत तक की बौद्धिक यात्रा
यह पुस्तक केवल मैकाले की जीवनी नहीं है। यह उस पूरे युग का दार्शनिक और ऐतिहासिक अध्ययन है जिसने भारत के बौद्धिक स्वरूप को बदलकर रख दिया।
पुस्तक में शामिल हैं—
✔ 1813 का चार्टर एक्ट
✔ 1833 एवं 1853 के चार्टर एक्ट
✔ प्राच्य-पाश्चात्य विवाद
✔ बैंटन प्रणाली
✔ वुड डिस्पैच
✔ एडम रिपोर्ट
✔ मैकाले द्वारा निर्मित भारतीय दंड संहिता (IPC)
✔ आधुनिक भारतीय न्याय प्रणाली पर उसका प्रभाव
✔ मानसिक दासता और सांस्कृतिक विमुखता का मनोविश्लेषण
✔ और अंततः—भारत का पुनर्जन्म
लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने भारत को “उपयोगी” तो बनाया, लेकिन “जागरूक” नहीं।
उसने भाषा तो दी, पर सांस्कृतिक स्मृति छीन ली।
उसने ज्ञान दिया, पर आत्मबोध नहीं।
लेखक परिचय—डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
डॉ. विद्यासागर उपाध्याय आधुनिक भारत की सांस्कृतिक चेतना, दार्शनिक परंपरा और वैदिक विमर्श के सबसे सम्मानित विद्वानों में से एक हैं। उनके शब्दों में भारतीय ज्ञान केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवंत चेतना है।
डॉ. उपाध्याय—
● वेदविद्या, भारतीय दर्शन और राष्ट्रीय चेतना के ज्ञाता
● देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में मुख्य वक्ता
● 20 से अधिक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथों के रचनाकार
● 100 से अधिक शोध-पत्रों के लेखक
उनके कुछ महत्वपूर्ण ग्रंथ—
- अष्टावक्र गीता — अभिनव भाष्य
- अथातो ब्रह्म जिज्ञासा
- सनातन दर्शन का मूल
- अवेस्ता और वेद
- सत्य कौन? तिलक अथवा अम्बेडकर
- The Republic of Hindustan
- और अब—लॉर्ड मैकाले: नायक अथवा खलनायक?
डॉ. उपाध्याय को 50 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें—
‘वेद विद्या मार्तंड’,
‘वेदांत विशारद’,
‘स्वामी विवेकानंद युवा गौरव सम्मान’,
‘डॉ. राधाकृष्णन शिक्षक रत्न’,
‘ग्लोबल आइकॉन अवार्ड’,
‘महामहोपाध्याय सम्मान’
जैसे प्रतिष्ठित अलंकरण शामिल हैं।
सांस्कृतिक चेतना और भारतीय आत्मबोध की पुनर्स्थापना में उनका योगदान अद्वितीय है।
क्यों आवश्यक है यह पुस्तक?
आज का युवा अंग्रेज़ी में सहज है, तकनीक में सक्षम है, पर अपनी जड़ों से अक्सर दूर होता जा रहा है।
हम पढ़ते ज़रूर हैं—लेकिन क्या हम समझते हैं कि हमारी शिक्षा की नींव कहाँ से आई?
▪ क्या हम आज भी पश्चिमी सोच से संचालित हैं?
▪ क्या हमारी शिक्षा भारतीयता को पोषित करती है?
▪ क्या हम अपनी ही सभ्यता को परखने के लिए पश्चिमी चश्मा पहनते हैं?
यह पुस्तक इन्हीं प्रश्नों का उत्तर है।
यह हमें उस मंज़िल तक ले जाती है जहाँ हम स्वयं से सामना करते हैं—
हम क्या बने हैं और क्या बन सकते थे।
पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ
🔸 ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का गहन विश्लेषण
🔸 प्रबुद्ध शैली और सशक्त भाषा
🔸 भारतीय अस्मिता पर प्रभावों की व्याख्या
🔸 आधुनिक शिक्षा प्रणाली का मूल्यांकन
🔸 मैकाले की दोनों छवियों—रचनाकार और विध्वंसक—का संतुलित विवेचन
🔸 भारतीय आत्मा के पुनर्जागरण का सशक्त संदेश
यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य है—
● शोधार्थी
● शिक्षाविद
● इतिहास-विद
● दार्शनिक
● साहित्यप्रेमी
● और हर वह भारतीय जो अपनी जड़ों को समझना चाहता है।
प्रेस रिलीज़ का मुख्य संदेश
“लॉर्ड मैकाले — नायक अथवा खलनायक?” केवल एक पुस्तक नहीं,
यह भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का घोषणापत्र है।
यह ग्रंथ पाठक को उसकी भाषा, उसकी शिक्षा, उसकी सोच, उसकी स्मृति और उसके स्वाभिमान के प्रश्नों से जोड़ता है।
यह स्मरण कराता है कि सभ्यताएँ बाहरी आक्रमण से नहीं,
अपनी स्मृति खो देने से नष्ट होती हैं।
डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की यह रचना उसी स्मृति की पुकार है।
यह वह दर्पण है जिसमें भारत स्वयं को देख सकता है—
अपनी कमजोरियाँ भी, और अपना सामर्थ्य भी।
निष्कर्ष
आज जब भारत विश्व पटल पर अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है,
यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि आधुनिकता तभी सार्थक है जब वह अपनी जड़ों से सिंचित हो।
“लॉर्ड मैकाले – नायक अथवा खलनायक?”
भारत की शिक्षा, चेतना और सांस्कृतिक यात्रा का ऐसा दस्तावेज़ है
जो आने वाले वर्षों तक शोध और विमर्श का केंद्र रहेगा।
यह पुस्तक हर भारतीय के लिए अनिवार्य है,
क्योंकि यह हमें स्वयं से मिलवाती है—
और शायद यही इसके लेखन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
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