पुस्तक विमोचन: सनातन सभ्यता का संकट : विखंडन के कारण और पुनर्जागरण का मार्ग

पुस्तक विमोचन: सनातन सभ्यता का संकट : विखंडन के कारण और पुनर्जागरण का मार्ग

भारत की सनातन सभ्यता केवल धार्मिक आस्थाओं, परम्पराओं और रीति-रिवाजों का समुच्चय नहीं, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित एक व्यापक जीवन-दृष्टि है, जिसने मानव, समाज, प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। इसी सभ्यतागत चेतना के सामने उपस्थित चुनौतियों, उनके कारणों और उनसे उबरने के संभावित मार्गों को गहराई से समझने का प्रयास करती है डॉ. सुमन कुमार दास, आध्यात्मिक नाम स्वामी सुमनानन्द नाथ, की पुस्तक “सनातन सभ्यता का संकट : विखंडन के कारण और पुनर्जागरण का मार्ग”। यह ग्रन्थ ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय समाज तीव्र सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और आर्थिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है।

यह पुस्तक सनातन समाज के भीतर मौजूद विभिन्न प्रकार के विखंडनों और चुनौतियों को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, वैचारिक, सामाजिक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करती है। लेखक ने जातिगत विभाजन, पंथगत आग्रह, सांस्कृतिक हीनभावना, परिवार संस्था के क्षरण, शिक्षा और परम्परा के बीच बढ़ती दूरी, धर्मांतरण, उपभोक्तावाद तथा संगठित नेतृत्व की कमी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीरता से विचार किया है। पुस्तक का उद्देश्य केवल समस्याओं को सामने रखना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि इन परिस्थितियों ने समाज की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को किस प्रकार प्रभावित किया है।

आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में नई पीढ़ी और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के बीच बढ़ती दूरी भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। आधुनिक शिक्षा, तकनीक और वैश्वीकरण के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक स्मृति, जीवन मूल्यों और परम्परागत ज्ञान से जुड़ाव बनाए रखना किस प्रकार सम्भव हो सकता है, यह पुस्तक पाठकों को इस दिशा में गंभीर आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है। लेखक का दृष्टिकोण अतीत के गौरव तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान की चुनौतियों को समझते हुए भविष्य के लिए एक सशक्त और व्यावहारिक दृष्टि विकसित करने पर केंद्रित है।

इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह केवल संकट का वर्णन नहीं करती, बल्कि पुनर्जागरण का व्यवहारिक मार्ग भी प्रस्तुत करती है। परिवार, मन्दिर, आश्रम, गुरुपरम्परा, संस्कार, स्वाध्याय, सेवा, आर्थिक स्वावलम्बन और सामाजिक समरसता को लेखक पुनर्निर्माण के प्रमुख आधारों के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि किसी भी सभ्यता का संरक्षण केवल नारों, उत्सवों या प्रतिक्रियाओं से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए ज्ञान, अनुशासन, संगठन, साधना और उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण आवश्यक है।

डॉ. सुमन कुमार दास, जिन्हें आध्यात्मिक जगत में स्वामी सुमनानन्द नाथ के नाम से जाना जाता है, प्रख्यात लेखक, दार्शनिक, भाषाविद्, उद्यमी और कौलाचार्य हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र तथा रूसी भाषा का अध्ययन किया और मॉस्को से भाषाविज्ञान में पीएचडी प्राप्त की। वे खजुराहो स्थित ललिता दिव्याश्रम के संस्थापक एवं पीठाधीश्वर हैं। अध्यात्म, तन्त्र, भारतीय संस्कृति, स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि और जीवन प्रबन्धन जैसे विविध विषयों पर उनकी सत्तर से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके द्वारा विकसित इकतालीस दिवसीय मन्त्रयोग साधना ने देश-विदेश के अनेक साधकों को आत्मानुशासन, साधना और आन्तरिक रूपान्तरण की दिशा में प्रेरित किया है।

“सनातन सभ्यता का संकट: विखंडन के कारण और पुनर्जागरण का मार्ग” पाठक के सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न रखती है कि किसी सभ्यता का संरक्षण केवल उसके अतीत का गौरवगान करने से सम्भव है या इसके लिए वर्तमान में जिम्मेदार और सक्रिय आचरण की भी आवश्यकता है। पुस्तक का संदेश इसी बिन्दु पर महत्वपूर्ण बनता है। सनातन चेतना को सशक्त बनाए रखने के लिए परिवारों में संस्कार, समाज में समरसता, युवाओं में ज्ञान और आत्मविश्वास, शिक्षा में सांस्कृतिक दृष्टि तथा जीवन में सेवा और अनुशासन की आवश्यकता है।

यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है जो भारतीय सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक परम्परा और सामाजिक संरचना से जुड़े प्रश्नों को गंभीरता से समझना चाहते हैं। यह केवल अतीत की ओर देखने का आग्रह नहीं करती, बल्कि वर्तमान को समझते हुए भविष्य के निर्माण पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। सनातन सभ्यता की शक्ति उसके आत्ममंथन, निरन्तर विकास और समय के साथ अपने मूल जीवन-मूल्यों को नए संदर्भों में अभिव्यक्त करने की क्षमता में निहित रही है।

इसी दृष्टि से “सनातन सभ्यता का संकट : विखंडन के कारण और पुनर्जागरण का मार्ग” एक महत्वपूर्ण वैचारिक कृति के रूप में सामने आती है, जो सनातन समाज की वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर संवाद स्थापित करने के साथ-साथ पुनर्जागरण की दिशा में व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर जिम्मेदारी निभाने का आह्वान करती है। यह पुस्तक केवल संकट को समझने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्ममंथन, जागरूकता और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने का निमंत्रण भी है।

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