वैदिक साहित्य में निहित देव-अवधारणा, उसके दार्शनिक आधार तथा विभिन्न व्याख्या-परंपराओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली डॉ. विभा सिंह की पुस्तक ‘वैदिक देव-विमर्श: वैदिक साहित्य में देव-अवधारणा का समीक्षात्मक अध्ययन’ वैदिक अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण एवं शोधपरक कृति है। यह ग्रंथ वैदिक साहित्य में देवों की प्रकृति, स्वरूप, भूमिका और आध्यात्मिक महत्त्व को प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करता है। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र से लेकर उपनिषदों में विकसित ब्रह्मवाद तक की वैचारिक यात्रा के माध्यम से लेखिका एक मूलभूत प्रश्न का अन्वेषण करती हैं कि वैदिक साहित्य में ‘देव’ की वास्तविक अवधारणा क्या है। क्या देव प्रकृति की शक्तियों के मानवीकृत रूप हैं, यज्ञीय कर्मकाण्ड के अधिष्ठाता हैं, परमेश्वर के विभिन्न गुणवाचक नाम हैं अथवा साधक की चेतना में सक्रिय दिव्य शक्तियों के प्रतीक हैं? पुस्तक इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श करते हुए पाठकों को वैदिक चिंतन की बहुआयामी परंपरा से परिचित कराती है।
छह सुव्यवस्थित अध्यायों में विभाजित यह पुस्तक वैदिक वाङ्मय के परिचय और ‘देव’ शब्द की व्युत्पत्ति से आरंभ होकर देवों के पृथिवी, अंतरिक्ष एवं द्युस्थानीय वर्गीकरण का विस्तृत विवेचन करती है। इसमें इन्द्र, अग्नि, वरुण और सोम जैसे प्रमुख वैदिक देवों के साथ-साथ देवियों की अवधारणा का भी विश्लेषण किया गया है। इसके अतिरिक्त, वैदिक देववाद के विकास में ‘ऋत’ की केंद्रीय भूमिका, सृष्टि संबंधी दार्शनिक चिंतन तथा नासदीय, पुरुष और हिरण्यगर्भ सूक्तों की वैचारिक महत्ता को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। इन विषयों के माध्यम से पुस्तक स्पष्ट करती है कि वैदिक साहित्य केवल धार्मिक आस्थाओं और अनुष्ठानों का संग्रह नहीं, बल्कि सृष्टि, अस्तित्व, चेतना और परम तत्त्व से जुड़े गहन प्रश्नों पर विचार करने वाली एक समृद्ध बौद्धिक परंपरा भी है।
इस ग्रंथ की प्रमुख विशेषताओं में वैदिक देव-अवधारणा की विभिन्न व्याख्या-परंपराओं का तुलनात्मक एवं समीक्षात्मक मूल्यांकन शामिल है। लेखिका यास्क, सायण, स्वामी दयानन्द, श्री अरविन्द तथा पाश्चात्य विद्वानों की व्याख्याओं का अध्ययन करते हुए उनके दृष्टिकोणों, योगदानों और सीमाओं को सामने लाती हैं। ‘एक मंत्र, चार दृष्टियाँ’ जैसे विश्लेषणात्मक प्रयोगों के माध्यम से एक ही वैदिक मंत्र की विभिन्न व्याख्याओं का तुलनात्मक परीक्षण किया गया है। यह पद्धति पाठकों को किसी एक व्याख्या को अंतिम सत्य मानने के बजाय विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने, उनके आधारों का मूल्यांकन करने और स्वतंत्र निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए प्रेरित करती है। पुस्तक में भारोपीय तुलनात्मक विमर्श, पौराणिक देवमंडल में वैदिक देव-अवधारणा के रूपांतरण तथा वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है।
पुस्तक का केंद्रीय प्रतिपादन यह है कि वैदिक देव-अवधारणा एकरेखीय या एकांगी नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है। आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक दृष्टियाँ इस अवधारणा के अलग-अलग आयामों को उद्घाटित करती हैं तथा एक-दूसरे की विरोधी होने के स्थान पर परस्पर पूरक रूप में सामने आती हैं। यही दृष्टिकोण इस ग्रंथ को वैदिक साहित्य के सामान्य परिचय से आगे ले जाकर एक गंभीर दार्शनिक एवं अनुसंधानपरक अध्ययन का स्वरूप प्रदान करता है। पुस्तक में सम्मिलित मंडलानुसार देव-सूक्तों की तालिकाएँ, पारिभाषिक शब्दावली, चयनित मंत्रों के भावार्थ और विस्तृत ग्रंथ-सूची इसकी उपयोगिता को और बढ़ाते हैं। इन विशेषताओं के कारण यह ग्रंथ न केवल वैदिक साहित्य के शोधार्थियों और अध्यापकों के लिए उपयोगी है, बल्कि संस्कृत, भारतीय दर्शन, धर्म-अध्ययन तथा वैदिक परंपरा में रुचि रखने वाले स्वाध्यायशील पाठकों के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ सामग्री सिद्ध हो सकता है।
इस पुस्तक की लेखिका डॉ. विभा सिंह संस्कृत एवं वैदिक साहित्य की समर्पित अध्येत्री हैं और वर्तमान में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के संस्कृत विभाग में अतिथि अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं। वैदिक साहित्य, विशेषकर ब्राह्मण-ग्रंथ, मंत्रार्थ-विमर्श और देव-अवधारणा उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। उनकी पहली पुस्तक ‘शतपथ ब्राह्मण कालीन समाज’ वर्ष 2023 में रेवा प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई थी, जिसे विद्वत्-जगत् में सराहना मिली। उनके अनेक शोध-पत्र ‘भास्वती’, ‘वाराणसी मैनेजमेंट रिव्यू’ और ‘रिसर्च हाईलाइट्स’ जैसी शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। ‘वैदिक मंत्रार्थ विमर्श’, ‘वेदों में अभिव्यक्त देव विषयक धारणा’, ‘औपनिषद दर्शन का अवदान’ और ‘ऋग्वैदिक वाङ्मय में मनोविज्ञान’ जैसे विषयों पर उनका अकादमिक कार्य वैदिक साहित्य के विविध पक्षों के प्रति उनकी गहरी रुचि और शोधपरक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ‘वेद और आगम’ तथा ‘ब्राह्मण साहित्य में आगम’ जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं और विभिन्न राष्ट्रीय कार्यशालाओं एवं संकाय-विकास कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता की है।
‘वैदिक देव-विमर्श: वैदिक साहित्य में देव-अवधारणा का समीक्षात्मक अध्ययन’ डॉ. विभा सिंह के दीर्घकालीन अध्ययन, चिंतन और शोध-साधना का परिणाम है। यह कृति वैदिक साहित्य की जटिल अवधारणाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करते हुए प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा के दार्शनिक एवं बौद्धिक पक्षों को समझने का मार्ग प्रशस्त करती है। साथ ही, यह पाठकों को वैदिक मंत्रों के अर्थ, देव-अवधारणा के विविध आयामों और भारतीय चिंतन की निरंतर विकसित होती परंपरा पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है। हिंदी में वैदिक देववाद के बहुआयामी स्वरूप पर केंद्रित यह पुस्तक अकादमिक जगत् में एक उपयोगी योगदान है, जो वैदिक साहित्य के अध्ययन को अधिक व्यापक, तार्किक और तुलनात्मक दृष्टि प्रदान करती है।