राहगीर राजीव की काव्य-कृति आवाज़ केवल एक किताब नहीं, बल्कि उन तमाम दिलों की सामूहिक पुकार है, जिनकी बात कभी सुनी नहीं गई। यह उन लोगों की आवाज़ है जिन्होंने प्रेम किया, खोया, टूटे, बिखरे, और फिर भी चुपचाप जीते रहे। जिनके हिस्से में न मरहम आया, न कोई ऐसा शख़्स जिसे हर क़ीमत पर पाया जा सके। जिनके सपनों का गला दबा दिया गया, जिनकी चौखटों पर दस्तक नहीं हुई, और जिनके होने या न होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा—आवाज़ उन्हीं अनकहे जज़्बातों का दस्तावेज़ है।
यह किताब उस चीख़ का नाम है जो तब जन्म लेती है जब अपने दर्द को कहने का कोई ज़रिया नहीं बचता, और सुनने वाला कोई नहीं होता। जब रूह अपने अकेलेपन और अंधेरे से बगावत करती है, तब जो शब्द फूटते हैं, वही शायरी बनते हैं। राहगीर राजीव ने इन्हीं चीखों और खालीपन को शब्दों का लिबास पहनाकर पाठकों के सामने रखा है। उन्होंने भावनाओं के खुरदुरेपन को सजाने या मुलायम बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि जीवन के अनुभवों—दर्द, उम्मीद, डर, गुस्सा और बंद कमरों के दुख—को उनकी असल शक्ल में इस किताब में पिरो दिया है।
आवाज़ प्रेम को किसी सौदे या शर्त की तरह नहीं देखती। यह किताब साफ़ कहती है कि प्रेम में हार या बर्बादी नहीं होती—प्रेम में बस दायरा बड़ा होता है, और इंसान अपने छोटे अस्तित्व से निकलकर विशालता में खो जाता है। जहाँ सवाल, शर्तें और हिसाब-किताब शुरू हो जाते हैं, वहाँ प्रेम नहीं, बाज़ार होता है; वहाँ आशिक़ नहीं, उपभोक्ता होते हैं। यही दर्शन इस किताब की रग-रग में बहता है।
लेखक राहगीर राजीव का जीवन स्वयं संघर्ष, अनुशासन और संवेदनशीलता का अनूठा संगम है। बिहार के एक सामान्य से गाँव में 29 दिसंबर 1985 को जन्मे राहगीर राजीव की स्कूली शिक्षा पिता के वायुसेना में कार्यरत होने के कारण देश के अलग-अलग शहरों—बैंगलोर, बीकानेर और कलाईकुंडा—में हुई। 2004 में दिल्ली विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की शुरुआत के बाद 2005 में भारतीय वायुसेना में चयन हुआ, जिससे पढ़ाई बीच में ही छूट गई। बावजूद इसके, सीखने और आगे बढ़ने की चाह कभी मरी नहीं। 2006 में चेन्नई से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया और 2009 में सरिता राय से विवाह के बाद जीवन को एक नई दिशा मिली। पत्नी की प्रेरणा से उन्होंने दोबारा शिक्षा की राह पकड़ी—वायुसेना में सेवारत रहते हुए पंजाब यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में स्नातक, स्वामी विवेकानंद सुभारती यूनिवर्सिटी से परास्नातक, UPSC की तैयारी, 2016 में UGC NET की सफलता और डॉ. भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा में शोध—यह सब उनकी अदम्य जिजीविषा का प्रमाण है।
आज राहगीर राजीव वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अलग-अलग शहरों में रहते हैं, जबकि उनका परिवार बैंगलोर में बसता है। एक ओर वे एथलेटिक मैराथन रनर हैं और जिम में युवाओं को टक्कर देने की ताक़त रखते हैं, तो दूसरी ओर उनके भीतर एक ऐसा शायर बसता है जो पिछले बाइस वर्षों से किसी अधूरेपन, किसी कमी को ढूँढता फिरता है। यही तन्हाई, तीरगी और वहशत उनकी शायरी में बार-बार उभरकर आती है।
उनकी रचनाओं में नियति के दोहरे रंग साफ़ दिखते हैं—बाहर रोशनी, रंग और मुस्कान; भीतर सियाह, खुरदुरी ज़िंदगी से जूझता एक बेचैन मन। वे खुद कहते हैं—
“इक तुझको भूलने के लिए जाने क्या क्या किया है मैंने
नशा, कलम, लोहा सभी कुछ तो आज़मा लिया है मैंने।”
आवाज़ ऐसे ही अशांत मन, बेबाक सोच और बिना लाग-लपेट की भावनाओं से जन्मी किताब है। यह पाठक से दूरी बनाकर बात नहीं करती, बल्कि उसे अपने भीतर खींच लेती है। यह किताब उन सभी के लिए है जिन्होंने कभी प्रेम किया है, खोया है, और फिर भी दिल खोलकर जीने की हिम्मत रखते हैं। राहगीर राजीव को उम्मीद है कि उनकी यह विनम्र कोशिश पाठकों की बेइंतिहा मोहब्बत पाएगी—और शायद कहीं न कहीं, किसी के भीतर दबी आवाज़ को अपनी ज़ुबान भी दे पाएगी।