देवांश शर्मा की कृति “मेरे परमपिता श्रीराम” एक ऐसी रचना है जो पाठक को धर्म, दर्शन और आत्मानुभूति के संगम तक ले जाती है। यह पुस्तक न तो केवल रामकथा का पुनर्पाठ है और न ही एक साधारण आत्मकथा, बल्कि यह एक संवेदनशील मनुष्य की गहन आंतरिक यात्रा का साक्ष्य है। जीवन के सबसे कठिन क्षणों में अपने जन्मदाता पिता को खोने के बाद लेखक ने श्रीराम को केवल आराध्य देव के रूप में नहीं, बल्कि पिता-तत्व के रूप में अनुभव किया—और यही अनुभूति इस ग्रंथ की आत्मा बन जाती है।