देवांश शर्मा की कृति “मेरे परमपिता श्रीराम” एक ऐसी रचना है जो पाठक को धर्म, दर्शन और आत्मानुभूति के संगम तक ले जाती है। यह पुस्तक न तो केवल रामकथा का पुनर्पाठ है और न ही एक साधारण आत्मकथा, बल्कि यह एक संवेदनशील मनुष्य की गहन आंतरिक यात्रा का साक्ष्य है। जीवन के सबसे कठिन क्षणों में अपने जन्मदाता पिता को खोने के बाद लेखक ने श्रीराम को केवल आराध्य देव के रूप में नहीं, बल्कि पिता-तत्व के रूप में अनुभव किया—और यही अनुभूति इस ग्रंथ की आत्मा बन जाती है।
देवांश शर्मा अपने निजी संघर्षों, पीड़ा, असहायता और अटूट विश्वास के माध्यम से यह स्थापित करते हैं कि श्रीराम कोई दूरस्थ, काल्पनिक आदर्श नहीं हैं, बल्कि आज के मनुष्य के लिए जीवन-पथ के सजीव सहयात्री हैं। पुस्तक में श्रीराम के जीवन के प्रमुख गुण—भक्ति, दया, सत्य, साहस, धैर्य, विनम्रता, त्याग, समता, क्षमा, स्नेह और अंततः शांति—को केवल शास्त्रीय दृष्टि से नहीं, बल्कि जीवन में घटित वास्तविक अनुभवों के आलोक में प्रस्तुत किया गया है। यही दृष्टिकोण इस कृति को अन्य धार्मिक पुस्तकों से अलग और अधिक मानवीय बनाता है।
इस ग्रंथ में रामायण के पात्र केवल कथा के चरित्र नहीं रह जाते, बल्कि पाठक के अंतर्मन से संवाद करते हैं। बाली, कैकयी, शबरी, विभीषण, मंथरा और रावण हमारे भीतर चल रहे द्वंद्व, भय, अहंकार, समर्पण और करुणा के प्रतीक बनकर उभरते हैं। लेखक बड़ी सहजता से यह दिखाते हैं कि रामकथा केवल अतीत की गाथा नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन की गहराइयों को समझने का दर्पण है।
पुस्तक का अंतिम अध्याय “अद्भुत शांति” पाठक को उस अवस्था की ओर ले जाता है जहाँ भय, अपेक्षा और अहंकार धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं और मनुष्य स्वयं को श्रीराम में समर्पित कर देता है। यह शांति किसी उत्तर की प्राप्ति से नहीं, बल्कि स्वीकार और समर्पण से जन्म लेती है।
“मेरे परमपिता श्रीराम” उन सभी के लिए है जो जीवन में टूटे हैं, पर जिन्होंने विश्वास नहीं छोड़ा। यह पुस्तक उन पाठकों से संवाद करती है जो प्रश्नों से अधिक शांति की तलाश में हैं और जो अपने भीतर एक ऐसे पिता-समान सहारे की खोज कर रहे हैं, जो हर परिस्थिति में साथ चलता है।