The Literature Times: Devansh Sharma, आपकी पुस्तक “मेरे परमपिता श्री राम” लिखने की प्रेरणा कहाँ से आई और यह विचार आपके भीतर कैसे जन्मा?
Devansh Sharma: मेरे लिए श्रीराम कभी केवल आस्था का विषय नहीं रहे। बचपन से ही मैंने उन्हें एक संरक्षक और पिता-सदृश शक्ति के रूप में महसूस किया है। यह दृष्टि मुझे मेरे नाना जी और मेरे पिता से मिली, जो अक्सर कहा करते थे कि “भगवान श्रीराम केवल पूजे नहीं जाते, वे जीवन को संभालते हैं।”