An Interview with Devansh Sharma

An Interview with Devansh Sharma

The Literature Times: Devansh Sharma, आपकी पुस्तक “मेरे परमपिता श्री राम” लिखने की प्रेरणा कहाँ से आई और यह विचार आपके भीतर कैसे जन्मा?
Devansh Sharma: मेरे लिए श्रीराम कभी केवल आस्था का विषय नहीं रहे। बचपन से ही मैंने उन्हें एक संरक्षक और पिता-सदृश शक्ति के रूप में महसूस किया है। यह दृष्टि मुझे मेरे नाना जी और मेरे पिता से मिली, जो अक्सर कहा करते थे कि “भगवान श्रीराम केवल पूजे नहीं जाते, वे जीवन को संभालते हैं।” जब मेरे भौतिक पिता का देहावसान हुआ, तो स्वाभाविक रूप से जीवन में एक गहरा सन्नाटा आया। उस समय बहुत कुछ छिनता हुआ लगा, लेकिन उसी शून्य में मुझे यह स्पष्ट अनुभूति हुई कि जो सच में पिता होता है, वह कभी अनुपस्थित नहीं होता। श्रीराम उस क्षण मेरे लिए विश्वास नहीं, बल्कि स्थिरता बन गए। इस पुस्तक का विचार उसी अनुभूति से जन्मा। यह किसी भावुक आवेग का परिणाम नहीं था, बल्कि एक शांत और दृढ़ निश्चय था—कि यदि श्रीराम ने मुझे जीवन के सबसे कठिन समय में थाम लिया, तो मेरा भी यह दायित्व है कि मैं उस अनुभव को शब्दों में ढालूँ। “मेरे परमपिता श्री राम” लिखते समय मेरा उद्देश्य यह दिखाना था कि श्रीराम केवल ग्रंथों या मंदिरों तक सीमित नहीं हैं। वे आज भी मनुष्य के जीवन में पिता की तरह मार्गदर्शन, धैर्य और शांति दे सकते हैं—यदि हम उन्हें उस रूप में स्वीकार करना सीख लें। यह पुस्तक उसी स्वीकार्यता और उसी कृतज्ञता का परिणाम है।

The Literature Times:  इस पुस्तक में श्रीराम को ईश्वर से अधिक पिता-तत्व के रूप में देखने का भाव बहुत गहरा है। यह दृष्टिकोण आपके जीवन में कैसे विकसित हुआ?
Devansh Sharma: देखिए, चमत्कारों पर कोई विश्वास करे या न करे— मैं करता हूँ, क्योंकि मैंने उन्हें जिया है। पाँच वर्ष की आयु में मेरे जीवन में एक अत्यंत गंभीर दुर्घटना हुई। मेरे माता-पिता गम्भीर रूप से घायल हुए, कई परिजनों का देहांत तक हो गया, लेकिन उस पूरे घटनाक्रम में मुझे एक खरोंच तक नहीं आई। बाद में यह बताया गया कि उस समय मैं अचेत अवस्था में भी श्रीराम नाम का जप कर रहा था। जीवन में ऐसी दो-तीन घटनाएँ और हुईं— हर बार संकट वास्तविक था, परिस्थितियाँ कठोर थीं— पर हर बार मैंने स्वयं को एक अदृश्य संरक्षण में पाया। उस संरक्षण में कोई दिखावा नहीं था, कोई प्रदर्शन नहीं था— बस एक पिता की तरह चुपचाप साथ निभाने वाली उपस्थिति थी। और जहाँ तक भावनात्मक सत्य की बात है— हम सब जानते हैं कि पिता के जाने के बाद व्यक्ति का बचपन अचानक समाप्त हो जाता है। लेकिन मेरी माता जी आज भी कहती हैं कि “ऐसा लगता है जैसे कोई तुम्हारे बचपन को आज भी जीवित रखना चाहता है— तुम्हारी आवश्यकताओं को, तुम्हारी इच्छाओं को बिना कहे पूरा करता हुआ।” यही अनुभव धीरे-धीरे मेरे भीतर स्पष्ट होता गया कि जिसे हम ईश्वर कहते हैं, वह केवल पूज्य सत्ता नहीं है— वह पालन करने वाला पिता भी है। भौतिक रिश्ते इस संसार तक सीमित होते हैं, लेकिन श्रीराम का संबंध जीवन से लेकर मृत्यु तक और मृत्यु के बाद भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।  हम मनुष्य अक्सर प्रभु को भूल जाते हैं— लेकिन श्रीराम कभी अपने संतानों को नहीं भूलते। और यही अनुभूति मेरे लिए उन्हें ईश्वर से आगे परमपिता बना देती है।

The Literature Times:  आपने व्यक्तिगत पीड़ा और आध्यात्मिक विश्वास को एक साथ पिरोया है। लेखन की इस प्रक्रिया ने आपको भीतर से कैसे बदला?
Devansh Sharma: मैं यह बात पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ कि मैं भी एक साधारण मनुष्य हूँ— र्थ, अपेक्षा और असुरक्षा से भरा हुआ। व्यक्ति तब तक स्वयं को समझता नहीं, जब तक जीवन उसे पूरी तरह असहाय न कर दे। मेरे जीवन में यह अवस्था मेरे पिता के देहावसान के बाद आई, और फिर नाना जी के जाने के बाद। उस समय ऐसा लगा कि सब कुछ होते हुए भी मैं बिल्कुल अकेला हूँ। और सच यही है— जब मनुष्य पूरी तरह टूटता है, तभी उसे ईश्वर की वास्तविक आवश्यकता समझ में आती है। तभी वह सहायता नहीं, सहारा खोजता है। इस लेखन की प्रक्रिया ने मुझे शिकायत से विश्वास की ओर मोड़ा। मैंने यह स्वीकार करना सीखा कि मैं नश्वर हूँ— मेरे जैसे हर मनुष्य की एक सीमा है। हम आते हैं, निभाते हैं और चले जाते हैं। लेकिन प्रभु श्रीराम न काल से बंधे हैं, न परिस्थिति से। वे त्रेता में भी थे, आज भी हैं, और आगे भी रहेंगे। यह बोध मेरे भीतर एक गहरी शांति लेकर आया। अब जीवन की पीड़ा मुझे तोड़ती नहीं— वह मुझे झुकना सिखाती है। एक दिन मैं नहीं रहूँगा, लेकिन मेरी आने वाली पीढ़ियाँ रहेंगी। और मैं उन्हें यही सिखाना चाहूँगा कि व्यक्तिगत पीड़ा के समय सबसे पहले श्रीराम को स्मरण करना चाहिए क्योंकि वे कभी साथ छोड़ते नहीं। देवांश मिट सकता है, लेकिन श्रीराम नहीं। और इसी सत्य को स्वीकार करना मेरे जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन रहा है।

The Literature Times:  इस पुस्तक को लिखते समय कौन-सा भावनात्मक क्षण आपके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रहा?
Devansh Sharma: मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षण कृतज्ञता को सही रूप में व्यक्त करना रहा। अक्सर ऐसा होता है कि जब जीवन में सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार मिलने लगता है, तो मनुष्य अनजाने में कृतज्ञ होना भूल जाता है। मैं अपने हृदय से हमेशा यही कामना करता हूँ कि मैं सदैव विनम्र बना रहूँ— प्रभु श्रीराम के प्रति भी और उन सभी व्यक्तियों के प्रति भी जिन्होंने मेरे जीवन के सबसे कठिन समय में मेरा साथ दिया। इस पुस्तक में मैंने जिनका उल्लेख किया है— विश्व शोभित कपूर जी, मेरे पिता श्री संजय जी, और मेरे जीवन में मार्गदर्शन देने वाले अमर त्रिपाठी भैया, आशुतोष भैया जैसे अनेक लोग— वे सभी मेरे लिए केवल सहायक नहीं, प्रभु की करुणा के माध्यम रहे हैं। मेरा विश्वास है कि प्रभु श्रीराम को हर बार पृथ्वी पर सशरीर आने की आवश्यकता नहीं होती। वे अपनी करुणा के माध्यम से मनुष्य के हृदय में प्रवेश करते हैं, और वहीं से किसी न किसी को अपने भक्तों की सहायता के लिए प्रेरित करते हैं। मेरे जीवन में भी यही हुआ। जिन लोगों ने मेरी सहायता की, वे स्वयं यह नहीं जानते थे कि वे उस समय किसके लिए, किस उद्देश्य से खड़े हो रहे हैं। उन भावनाओं को शब्द देना— बिना उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर कहे, बिना भावुकता का प्रदर्शन किए— यही मेरे लिए लेखन की सबसे कठिन प्रक्रिया रही। क्योंकि कृतज्ञता व्यक्त करना, अक्सर पीड़ा व्यक्त करने से भी अधिक कठिन होता है। और शायद इसी चुनौती ने मुझे भीतर से और अधिक शांत और विनम्र बनाया।

The Literature Times: रामायण के पात्रों को आपने मनुष्य के भीतर के द्वंद्व के रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रतीकात्मक दृष्टि का विचार कैसे आया?
Devansh Sharma: मैं ऐसा मानता हूँ कि रामायण जिस काल में रची गई, उस समय मनुष्य का स्वभाव अपेक्षाकृत अधिक सात्त्विक था। तब असुर बाहरी रूप में सामने आते थे— युद्ध होते थे, सीमाएँ स्पष्ट थीं, और शत्रु पहचाने जा सकते थे। लेकिन आज के युग में स्थिति बदल चुकी है। कलियुग में असुर हमारे सामने नहीं, हमारे भीतर निवास करने लगे हैं। आज रावण, मारीच या अन्य असुरी प्रवृत्तियाँ किसी बाहरी देह में नहीं, मनुष्य के अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और भय के रूप में उसके हृदय में वास करती हैं। और इसी प्रकार— श्रीराम की करुणा, माता सीता की सौम्यता, हनुमान जी की भक्ति और निष्ठा— ये सब भी मनुष्य के भीतर ही विद्यमान हैं। मेरे लिए रामायण का वास्तविक संदेश यह नहीं है कि युद्ध कहाँ हुआ, बल्कि यह है कि मनुष्य अपने भीतर किस पक्ष को चुनता है। यह दृष्टि मुझे केवल शास्त्रों से नहीं मिली, बल्कि जीवन से मिली। मैंने अपनी माता जी में करुणा और सहनशीलता देखी— जो मुझे माता सीता की स्मृति कराती है। मैंने शोभित कपूर जी में दया देखी। अमर भैया में वह मार्गदर्शन पाया जो गुरु वशिष्ठ के स्वरूप जैसा लगा। और आशुतोष भैया में वह अपनापन देखा जो विश्वामित्र की करुणा में दिखाई देता है। इन सब अनुभवों ने मुझे यह समझाया कि आज भी देवता और असुर दोनों मनुष्य के सामने हैं— बस रूप बदल गया है। अंततः चुनाव हमारा होता है— हम किसे पहचानते हैं, और किसे पोषित करते हैं। इसी संदर्भ में कबीर जी की पंक्ति मेरे लिए अत्यंत सार्थक हो जाती है— “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।” रामायण मेरे लिए मनुष्य के भीतर चल रहे उसी निरंतर युद्ध का आत्मिक मानचित्र है।

The Literature Times:  क्या आप मानते हैं कि आज की पीढ़ी के लिए श्रीराम एक समकालीन जीवन-पथ प्रदर्शक बन सकते हैं?
Devansh Sharma: मैं इसे किसी तर्क या आलोचना के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए यह एक आत्मिक सत्य है। आज का युवा गलत नहीं है— वह केवल भटका हुआ है। और जब मनुष्य दिशा खो देता है, तो वह मर्यादा भी खोने लगता है। श्रीराम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे मनुष्य को डाँटते नहीं— वे उसे संभालते हैं। वे यह नहीं कहते कि “तुम क्या गलत कर रहे हो,” वे यह दिखाते हैं कि “तुम क्या बन सकते हो।” आज जब युवा अधीरता, आकर्षण और असंतुलन के बीच जी रहा है, तो श्रीराम उसे संयम सिखाते हैं— बिना कठोर हुए। वे माता-पिता के सम्मान की बात करते हैं, लेकिन डर के माध्यम से नहीं— कृतज्ञता के माध्यम से। वे धर्म की बात करते हैं, लेकिन वर्चस्व के लिए नहीं— करुणा के लिए। मैं यह नहीं कहता कि हम श्रीराम जैसे बन सकते हैं। वह संभव भी नहीं है। लेकिन यदि कोई युवा उनके आदर्शों का केवल एक अंश भी अपने जीवन में उतार ले— तो उसका जीवन अपने-आप संतुलित हो जाएगा। मेरा निजी विश्वास है कि मानव जीवन क्षणिक है। हम सब एक दिन अपने परम पिता के सामने खड़े होंगे। उस दिन हमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि हमने कितना पाया— बल्कि यह पूछा जाएगा कि हम कैसे बने। और इसलिए मैं जीवन भर एक ही प्रार्थना करता हूँ— मैं भले ही कमजोर रहूँ, मैं भले ही असफल हो जाऊँ, लेकिन मैं कभी कठोर, अहंकारी या बुरा मनुष्य न बनूँ। यदि कभी मेरे भीतर बुराई हावी होने लगे, तो मैं प्रभु से यही कहूँगा— अब और नहीं। मेरे लिए श्रीराम आज भी उतने ही समकालीन हैं, क्योंकि वे मनुष्य को जीतना नहीं सिखाते— वे उसे पवित्र बनाए रखना सिखाते हैं। और आज के समय में शायद यही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

The Literature Times: “अद्भुत शांति” अध्याय पुस्तक का केंद्रीय बिंदु प्रतीत होता है। इस अध्याय के पीछे आपकी क्या सोच रही?
Devansh Sharma: मेरे लिए शांति कोई विचार नहीं है, कोई सिद्धांत नहीं है, और न ही वह कोई ऐसी अवस्था है जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँधा जा सके। शांति मेरे लिए अनुभव है— और वह अनुभव छोटे-छोटे क्षणों में उतरता है। जब मैं देखता हूँ कि मेरी संस्था के माध्यम से किसी गरीब बच्चे का पेट भरता है, तो वह शांति होती है। जब मेरे कर्तव्यों के कारण मेरे माता-पिता का हृदय संतुष्ट होता है, तो वह शांति होती है। जब मैं प्रतिदिन अपनी माता की सेवा करता हूँ और उनके चेहरे पर सुकून देखता हूँ— वह भी शांति है। मेरे भीतर प्रभु श्रीराम के प्रति पूर्ण विश्वास है— बिना शर्त, बिना प्रश्न। वह विश्वास मेरे जीवन की सबसे स्थिर शांति है। शांति का अर्थ यह नहीं कि जीवन में हार न हो। मेरे लिए शांति यह है कि यदि मैं हार भी जाऊँ, तो भी मैं भीतर से संतुष्ट रहूँ। यदि मुझे कोई दोष भी दे, तो भी मेरा व्यवहार भावनाओं के आवेग के अधीन न हो। शांति तब और गहरी होती है जब मुझे यह बोध होता है कि मेरा कोई शत्रु नहीं है। सब प्रभु की संतान हैं— और इसलिए, सब मेरे अपने हैं। यदि किसी ने मेरा हित किया, तो वह प्रभु की कृपा है। और यदि किसी ने अहित किया, तो मैं उसे भी अपने ही कर्मों का फल मानकर स्वीकार कर लेता हूँ। यहीं से “अद्भुत शांति” जन्म लेती है। शांति कोई ऐसी भावना नहीं जिसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़े। प्रभु का थोड़ा-सा स्मरण, उनके आचरण का अनुसरण, और उनकी प्रत्येक इच्छा को सहर्ष स्वीकार कर लेना— बस यही शांति है। इसीलिए यह अध्याय पुस्तक का अंत नहीं है, बल्कि उसकी पूर्णता है। जहाँ “मैं” धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है, और केवल स्वीकृति, संतोष और प्रभु शेष रह जाते हैं।

The Literature Times: यह पुस्तक उन लोगों से कैसे संवाद करती है जो आस्था और विश्वास के बीच संघर्ष कर रहे हैं?
Devansh Sharma: मेरी यह पुस्तक किसी को समझाने या मनाने का प्रयास नहीं करती। यह उन लोगों से संवाद करती है जो जीवन में शांति खोज रहे हैं, लेकिन उसे बाहरी उपलब्धियों में ढूँढते-ढूँढते थक चुके हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि धन, यश या सुविधाएँ हमें शांति देंगी। हम अथाह धन कमा लेते हैं, सम्मान भी पा लेते हैं, पर उसके बाद भी मन कहीं न कहीं अशांत ही रहता है। क्योंकि शांति का वास्तविक अर्थ संपत्ति नहीं, सहजता और विनम्रता है। मैंने अपने जीवन में ऐसे कई परिजनों और मित्रों को देखा है जिनके पास सब कुछ होते हुए भी मन शांत नहीं है। और मैंने स्वयं को भी देखा है— आज यदि मैं चाहूँ, तो एक अत्यंत सुविधासंपन्न जीवन जी सकता हूँ। लेकिन मैं आज भी अपने उसी पुराने घर में रहना पसंद करता हूँ जहाँ मेरा बचपन बीता। जहाँ के आँगन में मैंने खेला, और जहाँ मेरे नाना जी ने मुझे पहली बार भगवान श्रीराम की आरती सिखाई। मेरे लिए वही स्थान शांति का प्रतीक है— क्योंकि वह मुझे मेरी वास्तविकता से जोड़ता है। जो लोग जीवन में संघर्ष कर रहे हैं, उनसे मेरी पुस्तक यही कहती है कि जीवन को और जटिल मत बनाइए। साधारण रहिए, अपने आचरण को शुद्ध रखिए, और प्रभु पर अटूट विश्वास रखिए। यह समझना आवश्यक है कि मानव जीवन ही अंतिम सत्य नहीं है। यह प्रभु की लीला का एक चरण है। वास्तविक अस्तित्व तो आत्मा का है— जो प्रभु के साथ निरंतर वास करती है। प्रेम, धन या वैभव कभी भी ऐसे लक्ष्य नहीं होने चाहिए जिनके अधीन रहकर मनुष्य दुखी हो जाए। यदि किसी बात का दुख हो, तो केवल इस बात का हो कि हम अभी तक प्रभु के योग्य नहीं बन पाए। मैं किसी मंत्र-तंत्र में विश्वास नहीं करता। मैं केवल भक्ति में विश्वास करता हूँ— वह भक्ति जो निष्कलुष हो, प्रेम से युक्त हो, और जिसमें प्रभु हमसे अलग नहीं, हमारे अपने हों। हम उनके दास नहीं, हम उनके बालक हैं। और वे हमारे पिता। यह पुस्तक उसी बालक-भाव से उन सभी से बात करती है जो विश्वास और संदेह के बीच खड़े हैं— और उन्हें धीरे-धीरे शांति की ओर ले जाती है।

The Literature Times: एक लेखक के रूप में आपकी लेखन-यात्रा में इस पुस्तक का स्थान आप कैसे देखते हैं?
Devansh Sharma: मैं अपनी लेखन-यात्रा में इस पुस्तक को किसी उपलब्धि या पड़ाव के रूप में नहीं, बल्कि एक अत्यंत सुखद और पूर्ण यात्रा के रूप में देखता हूँ। जब मैं पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता हूँ, तो कभी-कभी स्वयं से ही प्रश्न करता हूँ— क्या सचमुच मैंने इतना जीवन जी लिया? मुझे वह पाँच–छह वर्ष का बालक याद आता है जिसे नाना जी मंदिर ले जाया करते थे, जो भगवान शिव पर जल चढ़ाना सीखता था, और प्रभु श्रीराम की आरती को बाल-मन से गुनगुनाया करता था। उसी उम्र में नाना जी ने उससे कहा था— “हो सकता है आने वाले वर्षों में मैं न रहूँ, पर एक बात हमेशा याद रखना— परिस्थिति के अनुसार प्रभु से प्रेम मत करना।” फिर मुझे वह आठ वर्ष का बालक याद आता है जिसे उसके पिता प्रतिदिन विद्यालय छोड़ने जाते थे, और हर दिन यही सिखाते थे कि कभी किसी से झगड़ा मत करना। माँ ने सिखाया कि सबकी सहायता करना, और जितना संभव हो, उससे अधिक दान करना— क्योंकि दान लेने वाला महान होता है, और देने वाला प्रभु का सेवक। और फिर, बहुत स्वाभाविक रूप से, प्रभु श्रीराम ने उस बालक का हाथ थाम लिया। उन्होंने मुझे कभी गलत आश्रय में भटकने नहीं दिया। जिस प्रेम से उन्होंने मुझे संभाला, वह किसी पिता से भी हजार गुना अधिक था। कभी यह अनुभव ही नहीं हुआ कि मैं अकेला हूँ। अपने अब तक के इक्कीस वर्षों को देखता हूँ, तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु श्रीराम हर क्षण पिता की भाँति मेरा ध्यान रखते रहे। मेरे जीवन में अब कुछ शेष नहीं लगता— न धन की आकांक्षा, न वैभव की चाह। जो होना था, प्रभु ने उससे कहीं अधिक दे दिया। अब बस विनम्रता चाहिए, और जितना जीवन शेष है, उसमें उनकी भक्ति का अवसर चाहिए। मेरी लेखनी, मेरा जीवन, मेरे शब्द— सब सेवा और समर्पण हैं। क्योंकि अंततः जो उनका है, वही उन्हीं को अर्पित होना है। यही कारण है कि यह पुस्तक मेरी लेखन-यात्रा का कोई अध्याय नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है।

The Literature Times: भविष्य में क्या आप इसी तरह की आध्यात्मिक और आत्मअनुभूति से जुड़ी रचनाएँ लिखने की योजना रखते हैं?
Devansh Sharma: मैं अपनी लेखन-यात्रा को किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए लेखन एक माध्यम है— उस प्रकाश को आगे बढ़ाने का, जो प्रभु श्रीराम ने मनुष्य के लिए स्थापित किया है। भविष्य में मेरी यही इच्छा है कि मैं अपनी लेखनी के माध्यम से उन व्यक्तियों और जीवन-दृष्टियों को सामने ला सकूँ जो श्रीराम की भक्ति और मर्यादा के अनुरूप निःशब्द रूप से जीवन जी रहे हैं। मैं आगे भगवान श्रीराम के प्रति समर्पण पर और उनके अनन्य भक्त हनुमान जी के आदर्शों पर लेखन करना चाहता हूँ— क्योंकि भक्ति जब कर्म में उतरती है, तभी समाज को दिशा मिलती है। इसके साथ-साथ मैं उन साधारण दिखने वाले परंतु असाधारण जीवन जीने वाले लोगों पर भी लिखना चाहता हूँ जिन्हें समाज शायद नहीं जानता, लेकिन जिनके माध्यम से प्रभु की शिक्षा आगे बढ़ती है। मेरे जीवन में ऐसे लोग रहे हैं— अमर भैया, जिनसे मुझे जब भी मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, मैं सहज रूप से जुड़ जाता हूँ। आशुतोष भैया, जो मेरे लिए केवल मित्र नहीं, परिवार जैसे हैं। और शोभित कपूर जी, जिन्होंने उस समय मेरा साथ दिया जब मैं जीवन के सबसे कठिन मोड़ पर था। मेरा विश्वास है कि प्रभु श्रीराम की शिक्षा आज भी उनके दूतों के माध्यम से ही समाज में प्रवाहित होती है। हम सब उनके दूत हैं— और हमारा कर्तव्य है उनके दिए हुए आचरण को अपने जीवन से आगे बढ़ाना। मेरे लिए लेखक होना इसी कर्तव्य को निभाने का सबसे सरल और स्वाभाविक मार्ग है। इसीलिए मेरी आने वाली रचनाएँ भी इसी भाव से निकलेंगी— न प्रचार के लिए, न यश के लिए, न धन या वैभव की आकांक्षा के लिए। यदि मेरी किसी भी पुस्तक को पढ़कर एक भी व्यक्ति प्रभु श्रीराम के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव पा ले— तो मैं यही मानूँगा कि मेरा जीवन अपने उद्देश्य को प्राप्त हो गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *