देवांश शर्मा की पुस्तक “मेरे परमपिता श्रीराम” एक ऐसी कृति है जो पाठक को पारंपरिक धार्मिक साहित्य की सीमाओं से बाहर ले जाकर आत्मिक अनुभूति और मानवीय संवेदनाओं की गहराई में उतारती है। यह पुस्तक न तो केवल रामकथा का पुनर्कथन है और न ही एक साधारण आत्मकथा, बल्कि यह एक टूटे हुए मनुष्य की आंतरिक यात्रा का सजीव दस्तावेज़ है।