Book Release: सरहद पार का बसेरा’ by CA प्रबीन झा

Book Release: सरहद पार का बसेरा’ by CA प्रबीन झा

विस्थापन, पहचान, स्मृति और अपनी जड़ों को तलाशने की एक मार्मिक यात्रा अब उपन्यास के रूप में पाठकों के सामने है। CA प्रबीन झा का पहला उपन्यास ‘सरहद पार का बसेरा’ एक ऐसे परिवार की बहुस्तरीय गाथा प्रस्तुत करता है, जिसकी शुरुआत 1950 के दशक में दक्षिण चीन के एक भूले-बिसरे पहाड़ी गाँव से होती है और जिसकी कहानी कई दशकों और पीढ़ियों को पार करते हुए भारत की धरती तक पहुँचती है। उपन्यास का उपशीर्षक ‘रक्त, रेखाएं और रोटी का इतिहास’ इसकी मूल संवेदना को और गहराई देता है—यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत लोगों की कथा है जिन्होंने बेहतर जीवन और अस्तित्व की तलाश में अपनी जन्मभूमि से दूर जाने का कठिन निर्णय लिया।

कहानी उस काली रात से शुरू होती है, जब बारह भाई अपनी माँ को पीछे छोड़कर अनजान भविष्य की ओर निकल पड़ते हैं। उनके सामने कोई निश्चित मंज़िल नहीं है, केवल जीवित रहने की उम्मीद और एक बेहतर जीवन की तलाश है। समंदर पार की यात्रा, अनजान बंदरगाह पर लूटे जाने की त्रासदी और फिर दार्जिलिंग की पहाड़ियों तक पहुँचने का संघर्ष उनके जीवन को एक ऐसी दिशा देता है, जिसकी उन्होंने शायद कभी कल्पना भी नहीं की थी। शून्य से शुरुआत करने वाले ये भाई अपनी मेहनत, संघर्ष और दृढ़ता के बल पर एक ऐसा संसार खड़ा करते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत बन जाता है।

लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं। जिस समृद्धि को पाने के लिए संघर्ष किया गया था, उसके साथ परिवार के भीतर बिखराव भी आता है। पीढ़ियाँ बदलती हैं, शहर बदलते हैं और बीते हुए समय की स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती हैं। इसी बदलते समय के बीच एक अकाउंटेंट अपने परिवार की जड़ों को खोजने उस गाँव तक पहुँचता है, जहाँ से उसके परिवार की कहानी कभी शुरू हुई थी। उसकी यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरी तय करने की यात्रा नहीं, बल्कि अतीत, स्मृतियों और अपनी पहचान के भीतर उतरने की यात्रा बन जाती है।

अपने पूर्वजों की भूमि पर पहुँचकर उसे कुछ ऐसे निशान दिखाई देते हैं, जो इतिहास के उन पन्नों को खोलते हैं जिन्हें समय ने लगभग मिटा दिया था। एक दीवार, कुछ पुराने निशान और एक परिवार के बलिदान से जुड़ा सच उसके सामने धीरे-धीरे उभरता है। यह खोज उसे एहसास कराती है कि परिवार की विरासत केवल उस जमीन में नहीं होती, जहाँ कभी उनके पूर्वज रहते थे, बल्कि उन कहानियों, शब्दों, संस्कृतियों और स्मृतियों में भी होती है, जिन्हें पीढ़ियाँ अपने साथ आगे ले जाती हैं।

‘सरहद पार का बसेरा’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका मानवीय पक्ष है। उपन्यास विस्थापन को केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसके पीछे छिपे भावनात्मक संघर्ष को सामने लाता है—घर छोड़ने का दर्द, माँ से बिछड़ने की पीड़ा, नई जगह पर पहचान बनाने की चुनौती, भाषा को बचाए रखने की जद्दोजहद और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का प्रयास। यही कारण है कि इसकी कहानी एक परिवार से आगे बढ़कर उन सभी लोगों से जुड़ती है, जिन्होंने कभी अपनी जन्मभूमि से दूर जाकर नया जीवन शुरू किया है।

यह उपन्यास भाषा और पहचान के संबंध को भी बेहद संवेदनशीलता से सामने रखता है। समय और स्थान बदलने के बावजूद मनुष्य के भीतर अपनी मातृभाषा, अपनी स्मृतियों और अपने अतीत से जुड़े रहने की इच्छा बनी रहती है। कहानी इस प्रश्न को भी उठाती है कि जब पीढ़ियाँ अपनी मूल भूमि से दूर हो जाती हैं, तब उनकी वास्तविक विरासत क्या बचती है? जमीन, संपत्ति और भौतिक उपलब्धियाँ या फिर वह भाषा और स्मृति, जो उनके पूर्वजों की आवाज़ को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाती रहती है?

CA प्रबीन झा ने पेशे से वित्तीय क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद इस उपन्यास में मानवीय भावनाओं और ऐतिहासिक संवेदनाओं को केंद्र में रखा है। कोलकाता में एक प्रतिष्ठित सीए फर्म में पार्टनर के रूप में कार्यरत प्रबीन झा के लिए यह पुस्तक उनके पेशेवर जीवन से बिल्कुल अलग, लेकिन उनके भीतर लंबे समय से मौजूद कथाकार की अभिव्यक्ति है। ऐतिहासिक घटनाओं, पुराने दौर के संघर्षों और मानवीय रिश्तों के गहरे ताने-बाने में उनकी रुचि ने इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘सरहद पार का बसेरा’ की प्रेरणा एक वास्तविक मुलाक़ात से जुड़ी है। एक ऑडिट के सिलसिले में कोलकाता के चीनी-भारतीय, विशेष रूप से हक्का समुदाय के एक सदस्य से हुई बातचीत ने लेखक को विस्थापन, पहचान और अस्तित्व से जुड़े उन सवालों पर सोचने के लिए प्रेरित किया, जो आगे चलकर इस उपन्यास की नींव बने। एक बातचीत से जन्मी यह संवेदना धीरे-धीरे एक ऐसी पारिवारिक गाथा में बदल गई, जिसमें इतिहास और कल्पना के माध्यम से इंसानी रिश्तों, संघर्षों और स्मृतियों को आवाज़ दी गई है।

लेखक की यह पहली औपन्यासिक रचना पाठकों को केवल एक कहानी पढ़ने का अवसर नहीं देती, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों, अपनी भाषा और अपनी पारिवारिक स्मृतियों की ओर देखने के लिए भी प्रेरित करती है। यह उन अनकही कहानियों को सामने लाती है जो अक्सर इतिहास की बड़ी घटनाओं के बीच कहीं दब जाती हैं, लेकिन किसी परिवार की स्मृति में पीढ़ियों तक जीवित रहती हैं।

‘सरहद पार का बसेरा’ अंततः उस मानवीय सत्य की ओर ले जाता है कि इंसान जहाँ भी चला जाए, उसकी जड़ें उसके साथ चलती हैं। सरहदें जमीन को बाँट सकती हैं, शहर बदल सकते हैं और पीढ़ियाँ समय के साथ दूर हो सकती हैं, लेकिन स्मृतियाँ, भाषा और रिश्तों की विरासत मनुष्य के भीतर बनी रहती है। CA प्रबीन झा का यह पहला उपन्यास इसी विरासत की एक मार्मिक और संवेदनशील गवाही है—एक ऐसी कहानी, जिसमें एक परिवार का अतीत वर्तमान से मिलता है और एक पुरानी यात्रा नई पीढ़ी को अपनी पहचान का अर्थ समझाती है।

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