The Literature Times: Amit Kohli, अरण्यआख्यान– जनगणवन जैसे संवेदनशील और सामाजिक यथार्थ से जुड़े उपन्यास को चुनने के पीछे आपकी प्रेरणा क्या रही?
Amit Kohli: मेरे लिए यह कृति केवल साहित्यिक पाठ नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है। आदिवासी जीवन, उनकी संघर्षपूर्ण परिस्थितियाँ और जंगल की राजनीति – ये सब हमारे समय का ताज़ा इतिहास है। मुझे लगा कि इस उपन्यास को हिंदी में लाना ज़रूरी है ताकि व्यापक पाठकवर्ग इन आवाज़ों को सुन सके। प्रेरणा यही रही कि हाशिए पर खड़े समाज की पीड़ा और गरिमा को भाषा के माध्यम से साझा किया जाए।
The Literature Times: इस कृति में ‘जुरु’ केवल एक पात्र नहीं बल्कि एक पूरे समाज का प्रतिनिधि बन जाता है—इस चरित्र को आप किस रूप में देखते हैं?
Amit Kohli: जुरु मेरे लिए एक व्यक्ति से अधिक एक प्रतीक, माडिया जनजाति का एक प्रतिनिधि है। वह जंगल का बेटा है, लेकिन साथ ही वह उस समाज का दर्पण भी है जो लगातार शोषण, हिंसा और असुरक्षा से जूझ रहा है। जुरु की यात्रा हमें यह दिखाती है कि व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन कितने जटिल होते हैं और वे गहरे स्तर पर जुड़े होते हैं।
The Literature Times: उपन्यास यह प्रश्न उठाता है कि विचारधारा जन्म से तय होती है या परिस्थितियाँ उसे गढ़ती हैं—आप स्वयं इस प्रश्न को कैसे समझते हैं?
Amit Kohli: मेरे अनुभव में विचारधारा कोई स्थिर वस्तु नहीं है। यह जन्म से नहीं आती, बल्कि परिस्थितियाँ, अनुभव और संघर्ष उसे आकार देते हैं। व्यक्ति पर कोई बाह्य शक्ति विचारधारा थोप नहीं सकती, वह अन्दर से उपजती है। आदिवासी समाज में यह और भी स्पष्ट है – जहाँ जीवन की कठोरता और सत्ता की टकराहट विद्रोह और संश्लेषण, दोनों तरह के विचारों को गढ़ती है।
The Literature Times: मराठी मूल कृति का हिंदी अनुवाद करते समय आपके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
Amit Kohli: सबसे बड़ी चुनौती थी – स्थानीयता और देहभाषा को जस का तस बनाए रखना। उपन्यास के लेखक – विलास मनोहर की लेखन शैली सरसरी तौर पर बेहद सहज प्रतीत होती है; लेकिन उसके थोड़ा भीतर झाँकने पर आपको परत-दर-परत गरहाईयाँ नज़र आएँगी। सत्ता और समाज के द्वन्द्व को चित्रित करने वाले इस उपन्यास में वे कोई एक पक्ष नहीं लेते। बस आपके सामने शब्दों से परिस्थितियों का एक सजीव चित्र उकेरते हैं। उनके सरल शब्दों में भावनाओं के तमाम रंग हैं, करुणा, स्नेह, आक्रोश, बेबसी और विद्रोह के साथ कई जगह व्यंग्य और कटाक्ष भी हैं। उनकी इस शैली को, मराठी भाषा की बारीकियों समेत हिंदी में उतारते समय मुझे यह ध्यान रखना पड़ा कि लेखक का भाव और लय कहीं खो न जाए। भाषा का ताप और संवेदना दोनों को संतुलित करना मेरे लिए कठिन था।
The Literature Times: आदिवासी जीवन और उनकी देहभाषा को चित्रित करते समय आपने किन बातों का विशेष ध्यान रखा?
Amit Kohli: मैंने कोशिश की कि उनकी बोलचाल, माडिया जनजाति के हावभाव और उनके जीवन की सहजता को कृत्रिम न बनाया जाए। अनुवाद में उनकी देहभाषा को उसी गरिमा और सादगी के साथ रखा, ताकि पाठक माडिया समाज के जीवन को महसूस कर सके, न कि केवल पढ़े।
The Literature Times: यह उपन्यास पुलिस और माओवादी दोनों से उपजने वाली दहशत को संतुलित ढंग से दिखाता है—क्या यह संतुलन साधना कठिन था?
Amit Kohli: हाँ, कठिन था। क्योंकि दोनों ही पक्ष आदिवासी जीवन पर गहरा असर डालते हैं। लेकिन लेखक ने जिस संवेदनशीलता से इसे लिखा, उसी को मैंने अनुवाद में बनाए रखने की कोशिश की। संतुलन का अर्थ यहाँ किसी पक्ष को सही या गलत ठहराना नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की दृष्टि से देखना है।
The Literature Times: आपकी शिक्षा और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी यात्रा ने इस पुस्तक को किस तरह प्रभावित किया है?
Amit Kohli: मेरी शिक्षा और सामाजिक कार्यों ने मुझे यह सिखाया है कि साहित्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी है। जब मैंने इस उपन्यास का अनुवाद किया, तो मेरे भीतर वही दृष्टि सक्रिय थी – कि हर शब्द समाज के प्रति उत्तरदायी है। मैंने विनम्रतापूर्वक उस ज़िम्मेदारी को निभाने की कोशिश की है। सही-गलत का फैसला पाठक और समीक्षक करेंगे।
The Literature Times: आज के पाठक इस उपन्यास से क्या सीख या समझ अपने साथ लेकर जाएँ, ऐसी आपकी क्या अपेक्षा है?
Amit Kohli: मेरी अपेक्षा है कि पाठक आदिवासी जीवन को केवल ‘अन्य’ के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपने समाज का हिस्सा मानें। वे समझें कि जंगल और उसके लोग हमारी साझा विरासत हैं, और उनकी पीड़ा हमारी भी ज़िम्मेदारी है। ना तो विकास के नाम पर उन्हें उजाड़ना ठीक है ना ही जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के नाम पर उन्हें संग्रहालय की वस्तु बनाने की दरकार है। अनुसूचित जनजातियों को, खास तौर पर माडिया जैसी जनजातियाँ जो समाज की मुख्यधारा से दूर हैं, को बस इतना सशक्त, इतना शिक्षित और इतना जागृत बनाना काफी है कि वे अपने भले-बुरे का फैसला कर सकें। उनके लिए तथाकथित सभ्य समाज नीतियाँ बनाएँ, इससे बेहतर होगा कि माडिया जैसी जनजातियों को नीति-निर्माण की प्रक्रिया में हर स्तर पर शामिल किया जाए।
The Literature Times: क्या आपको लगता है कि अरण्य आख्यान जैसे उपन्यास मुख्यधारा की सोच को चुनौती दे सकते हैं?
Amit Kohli: निश्चित रूप से। यह उपन्यास हमें मुख्यधारा की सुविधाजनक धारणाओं से बाहर निकालता है। यह दिखाता है कि विकास और सुरक्षा की परिभाषाएँ कितनी जटिल हैं। ऐसे उपन्यास हमें सोचने पर मजबूर करते हैं और यही साहित्य का सबसे बड़ा काम है।
The Literature Times: आगे लेखन या अनुवाद के स्तर पर आप किन विषयों या अनुभवों को शब्दों में ढालना चाहते हैं?
Amit Kohli: मैं चाहता हूँ कि आगे भी हाशिए की आवाज़ों को सामने लाऊँ – चाहे वह आदिवासी जीवन हो, ग्रामीण संघर्ष हों या हमारी लोक परंपराएँ। साथ ही, शिक्षा और बच्चों के अनुभवों को भी साहित्य में जगह देना मेरे लिए महत्वपूर्ण रहेगा।