“संदेश” अननमेष अनंत का एक ऐसा उपन्यास है जो पाठक को मनोवैज्ञानिक गहराइयों, रहस्य, पौराणिक प्रतीकों और जीवन–मरण के प्रश्नों से भरपूर एक असाधारण यात्रा पर ले जाता है। कहानी की नायिका अन्विता, जिसकी जिंदगी कई वर्षों से टूटन, हिंसा, मानसिक शोषण और दर्द के बीच कैद रही है, इस उपन्यास की धुरी है। किताब की शुरुआत ही एक बेहद मार्मिक दृश्य से होती है—अन्विता गोवा के एक शांत, निजी बीच पर पहुँची है, क्योंकि वह अपनी ज़िंदगी खत्म करने का निर्णय ले चुकी है। इस भावनात्मक बोझ, टूटे आत्मविश्वास और जीवन से भागने की मानसिकता को लेखक ने अत्यंत सजीवता से उकेरा है ।
अन्विता का बीता हुआ जीवन उसके विवाह की असफलता और पति राकेश के आत्ममुग्ध, हिंसक, गैर-जिम्मेदार और छलपूर्ण व्यवहार से भरा पड़ा है। लंबे समय तक सहने, टूटने, रोने और अपनी पहचान मिटते देखने के बाद वह लगभग खत्म हो चुकी है। जिस दर्द और अपमान ने उसे बर्बाद किया, लेखक ने उसे बिना किसी अतिशयोक्ति के, सहज लेकिन गहरे असरदार तरीके से प्रस्तुत किया है। यही यथार्थात्मक लेखन पाठक को तुरंत अन्विता से जोड़ देता है।
मरने के ठीक पहले समुद्र की एक लहर उसके पैरों में एक बोतल टकराती है। इस बोतल में मौजूद संदेश—जो शायद किसी “अंशुमन” नामक व्यक्ति ने लिखा है—कहानी का मोड़ बदल देता है। यह संदेश किसी सामान्य चिट्ठी की तरह नहीं है; यह रूपकों, पौराणिक संदर्भों, स्थानों के संकेत, पहेलियों और आध्यात्मिक प्रतीकों से भरा हुआ है। पहली नज़र में यह संदेश अनर्थक लगता है, लेकिन धीरे-धीरे पाठक समझता है कि यह किसी रहस्य की ओर संकेत कर रहा है, किसी यात्रा की ओर, किसी खोज की ओर। यह बोतल अन्विता के जीवन को दो हिस्सों में बाँट देती है—पहले जहाँ वह मरना चाहती है, और दूसरे जहाँ वह फिर से जीने की कोशिश करती है। “मरने की इच्छा पर उत्सुकता ने विजय पा ली,” यह वाक्य अन्विता के परिवर्तन का आरंभ है ।
बोतल का संदेश अन्विता के मन में जिज्ञासा जगाता है और वह उसके अर्थ खोजने लगती है। अगले दिन नाश्ते के दौरान दो स्कूली लड़कियाँ उससे बात करती हैं और इसी बातचीत में “धोलावीरा” का नाम सामने आता है—एक प्राचीन सभ्यता, ज्ञान और जल–प्रबंधन का महान केंद्र। चौंकाने वाली बात यह है कि बोतल के संदेश में भी “सफेद सागर”, “सात स्वर”, “ढोल की थाप”, “ज्ञान के कुएं” जैसे संकेत मिलते हैं, जो धोलावीरा से गहरे जुड़े हैं । यह संयोग नहीं लगता।
यही वह क्षण है जब अन्विता समझती है कि यह संदेश उसी के लिए था—या कम से कम उसे इसकी ओर खिंचना ही था। वह तुरंत गुजरात के लिए निकलने का निर्णय लेती है। यहीं से उपन्यास एक भावनात्मक—से—दार्शनिक—से—रहस्यमयी यात्रा में बदल जाता है।
धोलावीरा पहुँचने पर अन्विता के भीतर अचानक शांति, अपनापन और किसी अदृश्य खिंचाव का एहसास होता है। खंडहरों में घूमते हुए, समय की मार से टूटी दीवारों को देखते हुए, उसे लगता है कि जैसे वह खुद भी एक खंडहर हो गई है—एक ऐसी इमारत जो कभी उज्ज्वल थी, पर अब लोग उसे देखने तो आते हैं, पर ठहरते नहीं। यह प्रतीकात्मक वर्णन लेखक की लेखन–शक्ति को प्रमाणित करता है।
कहानी आगे एक रहस्य–उपन्यास की तरह भी खुलती है—क्योंकि संदेश में दिए गए प्रतीक, पहेलियाँ और दिशाएँ धीरे-धीरे किसी खास लक्ष्य की ओर संकेत देती हैं। इन संकेतों में भारतीय पौराणिक साहित्य, वेद, पुराण, मेघदूत, पंचतत्व, समय–चक्र, पर्वत–प्रतीक और प्राकृतिक शक्तियों का अद्भुत मिश्रण है।
उपन्यास का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि यह मनोवैज्ञानिक दर्द को दार्शनिक संकेतों और ऐतिहासिक–पुरातात्विक ज्ञान से जोड़ देता है। अन्विता की यात्रा केवल धोलावीरा तक सीमित नहीं रहती; वह उसकी अंतर्मन की यात्रा बन जाती है—जहाँ वह खुद को नए सिरे से खोजती है, अपने दर्द से बाहर आती है और “अंकतम सत्य” की तलाश शुरू करती है।
लेखक ने उपन्यास में स्त्री मन, संबंधों की जटिलता, स्वतंत्रता के संघर्ष, आत्ममुग्धता वाले पति के मानसिक अत्याचार, और जीवन में खोई हुई रोशनी को वापस पाने की प्रक्रिया को बहुत संवेदनशीलता से दर्शाया है। भाषा सरल लेकिन साहित्यिक है, और वर्णन इतने जीवंत हैं कि पाठक कहानी को जीने लगता है।
कुल मिलाकर, “संदेश” एक भावनात्मक, रहस्यमय, प्रतीक–समृद्ध और खूबसूरती से लिखी गई कहानी है—जो पाठक को सिर्फ मनोरंजन नहीं देती, बल्कि कई प्रश्नों के उत्तर खोजने पर मजबूर कर देती है। यह उपन्यास मानव–मन की टूटन, पुनर्जन्म और अर्थ की तलाश की एक शक्तिशाली दास्तान है।